शुक्रवार, 22 मई 2020

कौन समझे पीर परायी.....

 

किसी ने सच ही कहा....
कौन समझे पीर परायी.....

आज की परिस्तिथियों को कुछ शब्दों में बांधने की कोशिश की है... ये दर्द शायद इतने गहरे हैं कि शब्दों में बांध पाना मुश्किल है, जो महसूस कर पायी उसको प्रस्तुत करने की कोशिश की है... आप सभी को मेरे शब्दों में उन बेबस लोगों का दर्द महसूस हो तो मुझे comment box में ज़रूर बताएं.... और अगर मुझसे कहीं गलती हुई हो तो उसे भी जरूर बताएं ये मुझे आगे बहुत ध्यान दिलाएगा....

कविता का शीर्षक कौन समझे पीर परायी लिखा है जो कि सच है... हम उस दर्द को देख पाते पर ना उसे बांट पाते हैं ना उसे कम कर पाते....

कुछ बोल इस तरह है....

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